# ऊधो!, तजु अद्वैत विचार।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0790-M19-K039
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 39
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 370–371

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, तजु अद्वैत विचार।  
<a id="line-2"></a>सृष्टि आदि जो करत ब्रह्म सो, अस कह वेद पुकार।  
<a id="line-3"></a>जीव ब्रह्म को अंतर केतिक, सुनहु कहति श्रुति चार।  
<a id="line-4"></a>एक व्याप्य, इक व्यापक, इक है, भृत्य एक भरतार।  
<a id="line-5"></a>एक अंश, इक अंशी, इक है, सुत, इक पितु करतार।  
<a id="line-6"></a>एक प्रेर्य, इक प्रेरक, इक है, अणु इक विभु उर धार।  
<a id="line-7"></a>इक है अल्प-शक्ति -युत इक है, सर्व शक्ति -आधार।  
<a id="line-8"></a>बनि द्वैती “कृपालु” अब ऊधो!, भजिय ब्रह्म साकार॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रजदेवियाँ ज्ञानाभिमानी उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव! तुम अपना अद्वैत विचार छोड़ दो। जीव एवं ब्रह्म यह दो तत्व मान लो। जो सृष्टि करता है, सृष्टि की रक्षा करता है एवं प्रलय करता है, बेद के सिद्धान्तानुसार वही ब्रह्म है। जीव ब्रह्म का भेद वेदों के अनुसार कितना बताया गया है, ध्यान हि सुनो। जीव व्याप्त है (क्योंकि जीव में ब्रह्म व्यापक है) ब्रह्म सर्वव्यापक है। जीव दास है, ब्रह्म स्वामी है (क्योंकि सेवक सेव्य भाव के बिना ब्रह्म की प्राप्ति ही असम्भव है)। जीव अंश है (क्योंकि ब्रह्म के अनेक गुणों से युक्त है, ब्रह्म अंशी है। जीव पुत्र है, ब्रह्म पिता है, वेद कहता है (अमृतस्य वै पुत्राः)। जीव प्रेर्य है (क्योंकि कर्म फल भोगवाने में ईश्वर प्रेरक है) ब्रह्म प्रेरक है। जीव सूक्ष्म है, ब्रह्म व्यापक है। जीव अनेक हैं, ब्रह्म एक ही है जिनको तुम अपना सखा मानते हो। जीव अल्प शक्तिमान है, ब्रह्म सर्वशक्तिमान है। 'कृपालु' कहते हैं कि उद्धव! अब अनेकानेक प्रमाणों से तुम्हारे अद्वैत मत का खण्डन हो गया अतएव तुम द्वैती बन कर सेव्य सेवक भाव में आकर सगुण साकार ब्रह्म श्यामसुन्दर की उपासना करो।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 739-740

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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