विरह-माधुरी · पद 38
ऊधो!, जाय कह्यो तुम वाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, jāya kahyo tuma vāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, जाय कह्यो तुम वाय।
2इक इक द्वै ह्वै जात जान सब, पै द्वै ह्वै इक आय।
3जग प्रसिद्ध यह चोर चोर दोउ, मौसियाउतहिं भाय।
4जस वे माधव तस तुम ऊधव, अंतर कछु न जनाय।
5उनने उर विरहाग लगाई, तुम लै घृत छिरकाय।
6मोहिं “कृपालु” नहिं कहन सुनन वे, करैं जोइ मनभाय॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! तुम उनसे जाकर कह देना कि यह तो सभी जानते हैं कि एक-एक मिलकर दो हो जाता है किन्तु यहाँ पर दो मिलकर एक होकर आये हैं अर्थात् तुम दोनों एक ही समान हो। संसार में यह कहावत प्रसिद्ध है कि चोर-चोर मौसियावत भाई होते हैं। हे उद्धव! जैसे माधव हैं वैसे तुम भी हो। तुम दोनों में कोई अन्तर नहीं है। उन्होंने हृदय में विरह की आग लगा दी और तुम उसके ऊपर घी का छिड़काव करने आये हो। 'कृपालु' के शब्दों में मुझे कुछ कहना सुनना नहीं है। उन्हें जो अच्छा लगे वही करें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 738-739