विरह-माधुरी · पद 37
ऊधो!, जनि कहियो कछु कान्ह।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, jani kahiyo kachhu kānha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, जनि कहियो कछु कान्ह।
2वे अति सरल-हृदय दुख पैहैं, सुनि मम प्रानन-प्रान।
3जो तुम लखत दशा अँखियन ते, सोउ सकें नहिं जान।
4जो हठ करि पूछें कहि दीजो, हैं प्रसन्न बनितान।
5पुनि जो पूछें"कही नहीं कछु", कहियो नहिं कछु आन।
6सोइ “कृपालु” कहियो तुम जासों, रह उन मुख मुसकान॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा प्रियतम को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! तुम उनसे कुछ मत कहना। वे अत्यन्त कोमल हृदय वाले हैं। उन्हें सुनकर दुःख होगा। वे हमारे प्राणों के भी प्राण हैं। हम उन्हें दुःखी नहीं करना चाहतीं। तुम जो ब्रजवासियों की दशा अपनी आँखों से देख रहे हो, उसे भी उनसे न बताना। अगर हठपूर्वक पूछें भी तो कह देना कि सब प्रसन्न हैं। यदि फिर भी पूछें कि उन लोगों ने कुछ कहा नहीं, तो और कुछ मत कहना केवल 'कृपालु' के शब्दों में उनसे वही कहना जिससे वे सदा की भाँति मुस्कराते रहें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 738