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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 36

ऊधो!, कह्यो इहै बलभाय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho! kahyo ihai balabhāya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, कह्यो इहै बलभाय।

2गोपन, गोपिन, गायन, बछरन, निशिदिन नीर बहाय।

3मुरछित छिति पर गिरत छिनहिं छिन,कहत"कन्हैया हाय!"।

4ज्यों प्रथमहिं आनंद-सिंधु महँ, दिय तिय, पतिहिं बहाय।

5त्यों अब विरह-सिंधु महँ दीनी, पति बनितादि डुबाय।

6बारेक आय “कृपालु” श्याम ब्रज, बूड़त लेहु बचाय॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! गोप समूह, गोपियाँ, गायें बछड़े तुम्हारे वियोग में दिन-रात आँसू बहा रहे हैं। "हाय कन्हैया'कह-कहकर मूर्च्छित होकर क्षण-क्षण में पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। जिस प्रकार तुमने प्रथम मिलन रस के आनन्द सिंधु में सबकी स्त्री, पति आदि को डुबो दिया था, उसी प्रकार अब तुम्हारे वियोग ने भी पति, वनिता आदि को दुःख सागर में डुबा दिया है। 'कृपालु' के शब्दों में सखियाँ कहती हैं कि हे ब्रजराज! यह तुम्हारा ब्रज डूब रहा है। एक बार अपना दर्शन देकर इसे बचा लो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 737