विरह-माधुरी · पद 35
ऊधो!, कहु कब ते अज्ञान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahu kaba te agyāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, कहु कब ते अज्ञान।
2यदि अज्ञान"अनादि अनंतहिं", तो अद्वैत न मान।
3यदि है"सादि अनंत"मिटै नहिं, वह कबहुँ जिय जान।
4"सादि सांत"तो लहि निज रूपहिं, पुनि मिटि जैहैं ज्ञान।
5जो लें मान"अनादि सांत"तो, सुनि लीजो करि कान।
6जगहिं “कृपालु” अनादि अनंतहिं, वेदन करत बखान॥
हिन्दी भावार्थ
गोप वधूटियाँ उद्धव से कहती हैं कि यह तो बताओ कि जीवों में अज्ञान कब से है? यदि अज्ञान को अनादि एवं अनन्त मानते हैं, (अर्थात् अज्ञान न कभी प्रारम्भ हुआ था और न कभी समाप्त होगा) तब तो तुम्हारा अद्वैत सिद्धांत ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि तब तो ब्रह्म एवं आज्ञान दोनों ही सनातन तत्व सिद्ध होंगे। यदि अज्ञान को सादि एवं अनन्त मान लिया जाय (एक दिन प्रारम्भ तो हुआ था किन्तु समाप्त कभी न होगा) तब तो किसी भी जीव की मुक्ति न होगी। यदि अज्ञान को सादि सान्त मान लिया जाय (एक दिन प्रारम्भ हुआ था एवं एक दिन समाप्त हो जायेगा) तब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि जीवात्मा अपने ज्ञान स्वरूप को प्राप्त होकर भी पुनः सांत मान लिया जाय (प्रारम्भ तो कभी नहीं हुआ किन्तु समाप्त हो जायगा) तो कान खोलकर सुन लो। 'कृपालु' कहते हैं कि फिर वेदों ने सृष्टि को अनादि अनन्त क्यों माना है? (सृष्टि सदा थी एवं सदा रहेगी) इस प्रकार ऊधो!! तुम्हारा अद्ठैत सिद्धान्त गलत सिद्ध हुआ।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 736-737