विरह-माधुरी · पद 34
ऊधो!, कहियो हरि समुझाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo hari samujhāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, कहियो हरि समुझाय।
2हम सब उनहिं न कबहुँ बिसरिहैं, वे चाहे बिसराय।
3वे मेरे प्रियतम, प्राणेश्वर, हम अबला असहाय।
4हम सब भई सनातन चेरी, वे चाहे ठुकराय।
5चितवत पंथ रैन-दिन देइहौं, अगनित जनम बिताय।
6पै “कृपालु” को भय पिय! जग सों, तव परतीति न जाय॥
हिन्दी भावार्थ
(ब्रज-गोपियाँ उद्धव से अपने प्यारे श्यामसुन्दर के लिए संदेश भेजती हैं।) हे ऊधो! प्रियतम से यह समझाकर कहना कि हम सब तो उन्हें कभी नहीं भूल सकतीं, वे चाहे हमें भला ही क्यों न दें। हे उद्धव। वे मेरे प्रियतम एवं प्राणों के स्वामी हैं तथा हम सब ब्रज-गोपियाँ केवल उन्हीं के बल एवं सहारे पर हैं। हम सब तो अनन्तकाल के लिए उनकी दासी बन चुकी हैं, वे चाहे कितना ही ठुकरायें। यह हम सब ब्रज-गोपियों का दृढ़ निश्चय कि दिन-रात प्रियतम की प्रतीक्षा करते हुए हम सब उनकी मिलन-माधुरी को आशा में अनन्त जन्म बिता देंगी। 'कृपालु' कहते हैं कि हे प्रियतम! ब्रज-गोपियों को केवल यही भय है कि कहीं तुम्हारे न आने से संसार का तुमसे विशवास न उठ जाय, अर्थात् अल्पज्ञ लोग तुम्हारी अकारण-करूणा की अन्तरंगता को न समझते हुए तुमको निष्ठुर न कहने लगें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 735-736