विरह-माधुरी · पद 33
ऊधो!, कहियो श्यामलगात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo shyāmala gāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, कहियो श्यामलगात।
2ब्रजवासिन की दशा बतायेहु, जस देखत तस तात।
3पुनि इमि कह्यो, श्याम बिनु यद्यपि, तलफति हौं दिनरात।
4पै न कबहुँ आवहिं मथुरा तजि, जो वह उनहिं सुहात।
5जोइ आचरन सुहात उनहिं बस, सोइ हमरेहुँ मनभात।
6सदा “कृपालु” रहौं भल विरहिनि, पै वे रह मुसकात॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा प्रियतम को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव तुम ब्रजवासियों की जैसी दयनीय दशा देख रहे हो वैसी ही बता देना। साथ ही यह भी कहना कि यद्यपि श्यामसुन्दर के बिना दिन-रात हम तड़प रही हैं तथापि यदि उन्हें मथुरा ही अच्छी लगती हो तो वे यहाँ कभी न आवें। उन्हें जो भी आचरण अच्छा लगता हो वही करें उसी में हम भी सुखी हैं। 'कृपालु' के शब्दों में हम लोग अनन्त काल तक भले ही विरह में तड़पते रहें किन्तु बे सदा मुस्कराते रहें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 734-735