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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 32

ऊधो!, कहियो श्याम सुजान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo shyāma sujāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, कहियो श्याम सुजान।

2पाण्डु रोग जनु भयो तुमहिं बिनु, जड़-जंगम पियरान।

3बछरन पियत न दूध सुरभि-थन, तृण न चरति गैयान।

4लता गुल्म औषधि सब सूखे, यमुना जलहुँ सुखान।

5गोपिन, गोपन की का कहिये, जिनके तुम हो प्रान।

6वे “कृपालु” भल भूलि जाहिं मोहिं, हौं न भूलि सक कान्ह॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उन श्यामसुन्दर से कह देना कि तुम्हारे वियोग में ब्रज के समस्त जड़ चेतन जीवों को पाण्डुरोग सा हो गया है, सब के सब पीले पड़ गये हैं। बछड़े गायों का दूध नहीं पीते, गायें घास नहीं चरतीं, लता गुल्म औषधि सब सूख गयीं और यमुना का जल भी सूख गया फिर जिन गोपियों एवं ग्वालों के तुम प्राण हो, उनकी दशा तो बिना कहे ही अच्छा है। 'कृपालु' के शब्दों में वे हम लोगों को भले ही भूल जाये किन्तु हम लोग उन्हें स्वप्न में भी नहीं भूल सकते।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 734