# ऊधो!, कहियो श्याम सुजान।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0783-M19-K032
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 32
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 367–367

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो!, कहियो श्याम सुजान।  
<a id="line-2"></a>पाण्डु रोग जनु भयो तुमहिं बिनु, जड़-जंगम पियरान।  
<a id="line-3"></a>बछरन पियत न दूध सुरभि-थन, तृण न चरति गैयान।  
<a id="line-4"></a>लता गुल्म औषधि सब सूखे, यमुना जलहुँ सुखान।  
<a id="line-5"></a>गोपिन, गोपन की का कहिये, जिनके तुम हो प्रान।  
<a id="line-6"></a>वे “कृपालु” भल भूलि जाहिं मोहिं, हौं न भूलि सक कान्ह॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उन श्यामसुन्दर से कह देना कि तुम्हारे वियोग में ब्रज के समस्त जड़ चेतन जीवों को पाण्डुरोग सा हो गया है, सब के सब पीले पड़ गये हैं। बछड़े गायों का दूध नहीं पीते, गायें घास नहीं चरतीं, लता गुल्म औषधि सब सूख गयीं और यमुना का जल भी सूख गया फिर जिन गोपियों एवं ग्वालों के तुम प्राण हो, उनकी दशा तो बिना कहे ही अच्छा है। 'कृपालु' के शब्दों में वे हम लोगों को भले ही भूल जाये किन्तु हम लोग उन्हें स्वप्न में भी नहीं भूल सकते।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 734

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
