विरह-माधुरी · पद 31
ऊधो!, कहियो नंदकुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, कहियो नंदकुमार।
2हम तुम कहँ जानति सब दिन ते, करुणा को भण्डार।
3यह जो अभिनय करत विरह को, सोउ समुझति ब्रजनार।
4मथुरा की का बात! जाहु भल, पुनि गोलोक मझार।
5पै जब निकसि जाहु हिय ते तब, मानि लेउँ निज हार।
6जो “कृपालु” मिलि विलग न होइ सक, सोई मम भरतार॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! अपने सखा नन्दकुमार से कह देना कि हम लोग तुमको अनादि काल से जानती हैं कि तुम करुणा के सागर हो। तुम जो यह वियोग का नाटक कर रहे हो, इसको भी हम लोग भली-भाँति समझती हैं। मथुरा को क्या बात है, तुम भले ही पुनः गोलोक चले जाओ फिर भी यदि मेरे हृदय से निकल जाओ तब मैं अपनी हार मान लूँगी। कृपालु' के शब्दों में जो मिल कर पृथक् न हो सके वही हमारा समर्थ प्रियतम है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 733