विरह-माधुरी · पद 30
ऊधो!, कहियो कृपानिधान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo kṛipānidhāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, कहियो कृपानिधान।
2बिनु कारण कृपालु वे माधव, वेद-पुरान बखान।
3एक बार महराज पधारें, दे दें दर्शन दान।
4जो यह नहिं करि सकें, कह्यो तब, दे दें यह वरदान।
5अगले जनम जनमि हम मथुरा, कुबरिहिं होंय न आन।
6तब “कृपालु” हो कृपा अवसि तिन, तब मिलि जैहैं कान्ह॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव। तुम उन कृपानिधान भगवान् से कह देना कि वेदों-पुराणों के सिद्धान्तानुसार वे बिना कारण के ही कृपा करने वाले हैं, अतएव कृपा करके केवल एक बार ही राजाधिराज पधार कर दर्शन दे दें। यदि वे यह न कर सकें तब उनसे कहना कि यह वरदान ही दे दें कि अगले जन्म में हम लोग मथुरा में ही जन्म लें एवं कुबरी का ही शरीर पावें। कृपालु' के शब्दों में गोपियाँ कहती हैं कि तब तो उनकी कृपा अवश्य हो जायेगी एवं वे अवश्य ही मिल जायेंगे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 732-733