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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 29

ऊधो!, कहियो उन भगवान।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo una bhagawāna

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, कहियो उन भगवान।

2उन बिन पल छिन तलफति निशिदिन, यद्यपि ब्रज वनितान।

3पै उनते कछु भीख न माँगति, ऐसेहिं कहियो कान्ह।

4जाको होय वियोग न ऊधो!, सोइ"प्रेम"बखान।

5जाको होय वियोग भूलिहुँ, सोइ"काम"जिय जान।

6हम “कृपालु” दोउ एक सदा ते, थे, हैं, रहिहैं, मान॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उन श्रीमान् भगवान् से कह देना कि यद्यपि हम सब उनके वियोग में प्रतिक्षण तड़प रही हैं किन्तु हम सब उनसे कुछ भीख नहीं माँगती। उद्धव इन्हीं शब्दों में उनसे कहना। हे उद्धव! प्रेम वही है जिसमें मिलन के पश्चात् कभी भी वियोग न हो सके और जिससे स्वप्न में भी वियोग हो जाय वह अशुद्ध कामना है। 'कृपालु' के शब्दों में हम सब एवं श्यामसुन्दर नित्य एक हैं। जिस प्रकार जल एवं तरंग दो स्वरूपं में प्रतिभासित होती हुई भी वस्तुतः एक ही वस्तु है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 732