विरह-माधुरी · पद 28
ऊधो!, कहियो उन नँदलाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo una naṁdalāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, कहियो उन नँदलाल।
2पहले तो मीठी बतियन को, भल फैलायेहु जाल।
3फँसीं जबै तेहि जाल अचानक, सब भोली ब्रज-बाल।
4तब अब कह सब निकसि जाहु येहि, तजि जालहिं ततकाल।
5यह सब दोष आय अँखियन को, जो देखी गोपाल।
6दोषहुँ जानि “कृपालु” रोष सँग, लागत लाल रसाल॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! तुम जाकर उन नन्दलाल से कह देना कि पहले तो मीठी-मीठी बातों का ऐसा जाल फैलाया कि सभी भोली-भाली ब्रज-बालाएँ उस जाल में फँस गयीं। अब वे कहते हैं कि सब लोग जाल को काटकर तुरन्त निकल जाओ। बलिहारी है। हे उद्धव! दोष तो मेरी इन आँखों का है जिन्होंने श्यामसुन्दर को प्रथम बार देखा। 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर के अनेकानेक दोषों को जानकर भी क्रोध नहीं आता अपितु वे उसी प्रकार प्यारे लगते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 731