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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 27

ऊधो!, कहियो उन चितचोर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo una chitachora

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो!, कहियो उन चितचोर।

2रास विलास हास परिहासन, प्रथम चोर चित मोर।

3अब तुम ते संदेश पठावत, ब्रह्मज्ञान चित जोर।

4मधुर मिलन रस सुधा माधुरिहिं, दियो विरह विष घोर।

5जो हौं प्रथमहिं अस जनतिउँ, तो, नहिं लखतिउँ दृग कोर।

6जबरा मार “कृपालु” बांधि के, करन न दे पुनि शोर॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उन चितचोर से जाकर कह देना कि पहले तो अनेक प्रकार के रास विलास परिहास आदि से हमारा चित्त चुरा लिया और अब तुमसे यह संदेशा भेज रहे हैं अपने चित्त को ब्रह्मज्ञान में जोड़ दो। हे उद्धव! श्यामसुन्दर ने तो मधुर मिलन के अमृत रस में विरह विष घोल दिया। यदि मैं पहले से ऐसा जानती तो मैं उनकी ओर निगाह उठाकर भी न देखती। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखि! क्या तूने यह कहावत नहीं सुनी कि "जबरा मारै रोबै न देय'अर्थात् वे जबर्दस्त हैं, जो चाहें सो करें।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 730-731