विरह-माधुरी · पद 26
ऊधो!, कहियो उन घनश्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahiyo una ghanashyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, कहियो उन घनश्याम।
2कोटिन ऊधो भलेइ पठावें, कोटि काम अभिराम।
3पै हमरे प्रति-रोम श्याम बस, तिलहु धरन नहिं ठाम।
4यह जानत उनहू निज मन महँ, कहैं न भल सुखधाम।
5हम नहिं कहति कछू उनते वे, सुखी रहें वसुयाम।
6पै “कृपालु” करि लेंय सुरति पिय, कबहुँ कबहुँ ब्रजबाम॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनायैँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर के पास संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उन घनश्याम से जाकर कह देना कि वे कोटि काम अभिराम श्यामसुन्दर हम लोगों को ज्ञान सिखाने के लिये चाहे करोड़ों उद्धव भेजें किन्तु हमारे रोम-रोम में एक मात्र वे ही बसे हैं, तिल धरने का भी स्थान नहीं है। यह बात अपने मन में वे भी अच्छी प्रकार से जानते हैं, भले ही अपने मुख से न कहें। हम उनसे कुछ नहीं कहतीं। वे सदा सुखी रहें। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि बस हम लोगों का इतना ही कहना है कि वे कभी-कभी हम लोगों का स्मरण कर लिया करें।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 729-730