विरह-माधुरी · पद 25
ऊधो! कहि दीजो संदेश।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahi dījo sandesha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो! कहि दीजो संदेश।
2ब्रज महँ रहे ब्रजेश, भये अब, मथुरा महँ मथुरेश।
3ब्रज महँ रह भोगेश, भये अब, मथुरा महँ योगेश।
4ब्रज महँ रह राधेश, भये अब, मथुरा महँ कुब्जेश।
5ब्रज महँ रह गोपेश, भये अब, मथुरा महँ भूपेश।
6अँगुठा-छाप “कृपालु” रहे, अब, पंडित भये विशेष॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! श्यामसुन्दर से यही संदेशा कह देना कि वे ब्रज में तो ब्रजेश ही थे किन्तु मथुरा में जाकर मथुरेश हो गये। पुनः कहना कि ब्रज में तो भोगियों के नेता थे किन्तु मथुरा में जाकर योगियों के नेता हो गये। और भी कहना ब्रज में जो श्री राधिका जी के स्वामी थे; किन्तु, मथुरा में जाकर श्रीमती कुब्जा के स्वामी हो गये। फिर कहना कि ब्रज में तो ग्वाल बालों के ही स्वामी थे किन्तु मथुरा में जाकर राजाओं के भी स्वामी बन गये। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि कहाँ तक कहें ब्रज में तो वे अँगूठा छाप निरक्षर भट्टाचार्य थे किन्तु अब मथुरा में जाकर महान् पण्डितराज हो गये हैं, तभी तो ज्ञानोपदेशक बने हुए हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 729