विरह-माधुरी · पद 24
ऊधो! कहि दीजो यह तात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahi dījo yaha tāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो! कहि दीजो यह तात।
2जोरे नात जासु ब्रज बनितनि, तोरि सकल जग नात।
3तोर्यो तृण सम नात हाय! सोइ, इक पल महँ बलभ्रात।
4ज्यों विधवा निज गर्भ पीर कहुँ, काहुहिं कहि न सकात।
5त्यों ब्रजनारिन पीर विरह की, काहुहिं कहत लजात।
6कहे बिनाहुँ “कृपालु” काउ सों, अब नाहिंन रहि जात॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएं उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! उन श्यामसुन्दर से कह देना कि जिन ब्रजांगनाओं ने समस्त संसार के नाते तोड़ कर एक मात्र तुम्हीं से नाता जोड़ा है, उनके उस प्रेम को तुमने एक क्षण में तृण के समान तोड़ दिया। यह शोभनीय नहीं है। जिस प्रकार विधवा अपनी गर्भ की पीड़ा को किसी से भी नहीं कह सकती, उसी प्रकार ब्रजांगनाएँ भी अपनी विरह वेदना को किसी से भी बताने में लजाती हैं। 'कृपालु के शब्दों में सखियाँ कहती हैं कि अब तो बिना किसी से कहे भी नहीं रहा जाता। हम लोगों की गति तो साँप छछूँदर के समान हो गयी है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 728-729