विरह-माधुरी · पद 23
ऊधो! कहि दीजो बलभ्रात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho! kahi dījo balabhrāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो! कहि दीजो बलभ्रात।
2जैसी प्रीति करी तुम मोते, तैसी कहुँ न सुनात।
3एक प्रेम लखि प्रेम करत जग, सब देखत दिन-रात।
4इक बिनु प्रेमहिं प्रेम करत जग, सब जानत पितु मात।
5इन दोउन सों रहित न काहुहिं, करत प्रेम इक तात।
6तुम “कृपालु” नहिं इन तीनिउ महँ, सब अटपट तव बात॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! प्राणवल्लभ श्यामसुन्दर से कह देना कि उन्होंने जिस प्रकार का प्रेम हम लोगों से किया है उस प्रकार का प्रेम कहीं सुनने में नहीं आता। अब तक तीन प्रकार के ही प्रेम विख्यात थे। एक तो वह जो दूसरे के प्रेम को देखकर प्रेम करते हैं। इसी को स्वार्थ का प्रेम भी कहते हैं। दूसरा प्रेम वह जिसमें बिना किसी के प्रेम किये ही प्रेम किया जाय। इस प्रकार का प्रेम सभी के माता-पिता (नवजात शिशु से) करते हैं। तीसरा वह है जो प्रेम करने वाले अथवा प्रेम न करने वाले दोनों से ही उदासीन रहता है। ऐसा प्रेमहीन हृदय आत्माराम, आप्तकाम, गुरुद्रोही एवं कृतघ्नी लोगों का होता है। 'कृपालु' के शब्दों में सखियाँ कहती हैं कि उद्धव! उनसे। 'कृपालु' के शब्दों में सखियाँ कहती हैं कि उद्धव! उनसे कहना कि तुम तो इन तीनों प्रेम से पृथक हो। तुम्हारी सभी आ अटपटी है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 727-728