विरह-माधुरी · पद 22
ऊधो! कहि दीजो उन जाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahi dījo una jāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो! कहि दीजो उन जाय।
2उन जस करी, करी नहिं तस कोउ, तबहुँ उनहिं मनभाय।
3जिन मैं भजी रैन दिन छिन-छिन, तन मन प्रान लुटाय।
4तिन मोहिं तजी दूध माखी जनु, धन्य प्रीति बलभाय।
5मो कहँ नहिं कछु सोच आपुनो, सोचत उन डरपाय।
6सुनि “कृपालु” कहुँ कोउ इन बतियन, उनहिं न दोष लगाय॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजते हुए कहती हैं कि हे उद्धव! उन श्यामसुन्दर से जाकर कह देना कि उन्होंने हमारे साथ जैसा किया है आज तक किसी ने किसी के साथ भी न किया होगा। फिर भी हम लोग उनसे उसी प्रकार प्रेम कर रही हैं एवं करती रहेंगी। जिनको अपना तन, मन, प्राण एवं सर्वस्व देकर हम लोगों ने दिन-रात भजा, उन्होंने हम लोगों दूध की मकखी की तरह अपने हृदय से निकाल दिया। उनके प्रेम की बलिहारी है। हे उद्धव! मुझे अपनी कोई चिन्ता नहीं है। मैं तो यही सोचकर डर जाती हूँ कि 'कृपालु' के शब्दों में कहीं कोई श्यामसुन्दर के इस व्यवहार को सुनकर उन पर कलंक न लगा दे। यदि ऐसा हुआ तो हम लोगों के जीवन को अनन्त बार धिक्कार है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 726-727