# ऊधो! कहि दीजो उन जाय।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0773-M19-K022
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 22
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 363–363

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>ऊधो! कहि दीजो उन जाय।  
<a id="line-2"></a>उन जस करी, करी नहिं तस कोउ, तबहुँ उनहिं मनभाय।  
<a id="line-3"></a>जिन मैं भजी रैन दिन छिन-छिन, तन मन प्रान लुटाय।  
<a id="line-4"></a>तिन मोहिं तजी दूध माखी जनु, धन्य प्रीति बलभाय।  
<a id="line-5"></a>मो कहँ नहिं कछु सोच आपुनो, सोचत उन डरपाय।  
<a id="line-6"></a>सुनि “कृपालु” कहुँ कोउ इन बतियन, उनहिं न दोष लगाय॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजते हुए कहती हैं कि हे उद्धव! उन श्यामसुन्दर से जाकर कह देना कि उन्होंने हमारे साथ जैसा किया है आज तक किसी ने किसी के साथ भी न किया होगा। फिर भी हम लोग उनसे उसी प्रकार प्रेम कर रही हैं एवं करती रहेंगी। जिनको अपना तन, मन, प्राण एवं सर्वस्व देकर हम लोगों ने दिन-रात भजा, उन्होंने हम लोगों दूध की मकखी की तरह अपने हृदय से निकाल दिया। उनके प्रेम की बलिहारी है। हे उद्धव! मुझे अपनी कोई चिन्ता नहीं है। मैं तो यही सोचकर डर जाती हूँ कि 'कृपालु' के शब्दों में कहीं कोई श्यामसुन्दर के इस व्यवहार को सुनकर उन पर कलंक न लगा दे। यदि ऐसा हुआ तो हम लोगों के जीवन को अनन्त बार धिक्कार है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 726-727

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## पद का स्रोत और उद्धरण

पद और उपलब्ध भावार्थ दिए गए स्रोत से लिप्यंतरित पाठ हैं। उद्धरण में स्रोत के शब्द, विराम-चिह्न और क्रम सुरक्षित रखें; लोप को स्पष्ट चिह्नित करें। सारांश या व्याख्या को अलग से अपना भावानुवाद बताकर इसी पद का संदर्भ दें। स्रोत में पूरे पद का भावार्थ है, शब्द-दर-शब्द या पंक्ति-दर-पंक्ति अर्थ नहीं। लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं।

यह अनौपचारिक, व्यक्तिगत और आंशिक संग्रह है।

मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
