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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 21

ऊधो! कहा कहौं तिन काहिं।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, kahā kahauṁ tina kāhiṁ

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1ऊधो! कहा कहौं तिन काहिं।

2अगनित गुन आगरि ब्रजनागरि, तजि कुबरिहिं घर जाहिं।

3जो उर महँ कछु और धार अरु, मुख औरहिं बतराहिं।

4ऐसे लबरन कहँ कहु ऊधो!, हौं केहि विधि पतियाहिं।

5जिनके प्रथम चरित सुमिरत ही, रोम-रोम हरषाहिं।

6उनके चरित “कृपालु” लखत अब, रोम-रोम डरपाहिं॥

हिन्दी भावार्थ

ब्रजांगनाएँ उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेश भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! हम उन श्यामसुन्दर को क्या कहें जो अगणित गुण वाली अनन्त ब्रजांगनाओं को छोड़कर कुबरी के घर जाते हैं। हे उद्धव! जो हृदय में कुछ और रखता है एवं मुख से कुछ और कहता है ऐसे लबार का तुम्हीं बताओ, हम कैसे विश्वास करें? जिनकी पूर्व वाली मधुर लीलाओं का स्मरण करते ही रोम-रोम गद्गद् हो जाता है। 'कृपालु' के शब्दों में सखी कहती है कि उन्हीं श्यामसुन्दर की वर्तमान करतूतों को देखकर रोम-रोम में डर भर जाता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 725-726