विरह-माधुरी · पद 20
ऊधो!, ऐसेहिं कहियो कान्ह।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: ūdho!, aisehiṁ kahiyo kānha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ऊधो!, ऐसेहिं कहियो कान्ह।
2वे ऐसी अबला प्रबला जिन, जीति न सक भगवान।
3वे सब देति चुनौती तुम कहँ, सुनहु खोलि निज कान।
4वे अस कहति, न चाहति हम सब, ब्रह्म-ज्ञान, अज्ञान।
5नहिं चाहति भगवान न चाहति, सुख बैकुण्ठ महान।
6वे “कृपालु” चाहति जिन प्रियतम, तिन उन माहिं समान॥
हिन्दी भावार्थ
ब्रजागनाएं उद्धव के द्वारा श्यामसुन्दर को संदेशा भेजती हुई कहती हैं कि हे उद्धव! श्यामसुन्दर से ऐसे ही जाकर कह देना कि वे अबलायें ऐसी प्रबल हैं कि उन्हें भगवान् भी नहीं जीत सकते। वे सब तुमको चैलेंज करती हैं कान खोलकर सुन लो। वो कहती हैं हम सब ब्रह्मज्ञान अथवा अज्ञान कुछ नहीं चाहतीं। हम लोग भगवान् को भी नहीं चाहते एवं भगवान् के बैकुण्ठ धाम के सुख को भी नहीं चाहते। 'कृपालु' के शब्दों - में वे कहती हैं कि हम लोग जिन प्रियतम को चाहते हैं वे प्रियतम हम में सदा समाये हुए हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 725