विरह-माधुरी · पद 19
आय री, दृग बरसावन सावन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āya rī, dṛiga barasāvana sāvana
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आय री, दृग बरसावन सावन।
2रस बरसावत लखि पिय आवन, हौं कह"हा! पिय आव न"।
3सब कह यह सावन मन-भावन, पै मो कहँ मन-भाव न।
4घन-दामिनि सब काहिं सुहावन, विरहिनि मोहिं सुहाव न।
5पपिहा पिवु धुनि सब हरषावन, पै मो कहँ हरषाव न।
6सब सुन चावन कोकिल गावन, हौं कह निगुरी गाव न।
7सब “कृपालु” शिखि-नृत्य लुभावन, पै मोहिं नेकु लुभाव न॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! पानी बरसाने वाला सावन का महीना आ गया है। प्रियतम का मिलन है उनके आनन्दाश्रु वह रहे हैं किन्तु मैं प्रियतम के वियोग में हाय! हाय! हूँ। यह सावन मिलन वालों को सुखदायी है किन्तु मेरे लिए तो दुःखदायी ही है। हैं किन्तु मुझ विरहिणी को कष्टप्रद ही है। पिउ""ध्वनि सब को हँसाती है किन्तु मुझे तो प्रियतम की याद में रुलाती ही है। बड़ी मधुर लगती है किन्तु मुझे तो विष के समान लगती है। कृपालु कहते हैं-मिलन वालों को तो मोर का नृत्य नितान्त रछ ह क लगता है किन्तु मुझे तो मोर पंख वाले की स्मृति आने से और भी कष्टप्रद बन जाता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 724-725