विरह-माधुरी · पद 18
आय नहिं, माधव माधव आय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: āya nahiṁ, mādhava mādhava āya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1आय नहिं, माधव माधव आय।
2कंत बसंत पाय जनु फूली, सरसों हिय हुलसाय।
3अंबहुँ गयो बौराय मनुहँ पुनि, कोकिल पिय-गुन गाय।
4प्रकटत तनु रोमांच भाव-जनु, फूल कदंब फुलाय।
5पतझड़ गयो आय पल्लव जनु, गयो विरह, पिय पाय।
6फूल पलास “कृपालु” फूलि जनु, हँसि हँसि हाय! चिढ़ाय॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! बसन्त आ गया किन्तु श्यामसुन्दर नहीं आये। अपने प्रियतम बसन्त को पाकर मानो सरसों हृदय में फूली नहीं समा रही है। आम तो मानो पूर्णतया बौराय गया है। कोकिल भी आनन्दातिरेक से बसन्त के गुण गा रही है। कदम्ब का फूल भी फूल कर मानो रोमांच सात्विक भाव को प्रकट कर रहा है। वृक्षों के सब पत्ते झड़ चुके हैं एवं उनके स्थान पर नये पत्ते आ गये हैं जैसे वियोग समाप्त होकर मिलन सुख प्राप्त हो गया हो। 'कृपालु' कहते हैं कि पलाश का फूल तो फूल कर जैसे हम विरहिणियों को हँस-हँस कर चिढ़ा रहा है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 723-724