विरह-माधुरी · पद 17
अहो हरि! अब न विरह सहि जात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho hari! aba na viraha sahi jāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो हरि! अब न विरह सहि जात।
2विरहानल दृग-जलहुँ जलायो, लायो मीचहुँ घात।
3आस-निरास ग्रंथि निरुबारत, इक पल कलप लखात।
4इन मन-इंद्रिन ते हम हारी, कोउ न सुनत इक बात।
5यद्यपि समुझत प्रीति-रीति भल, तदपि न धीर बँधात।
6जो भावे सो करिय हमारो, एक तुमहिं सों नात।
7कत “कृपालु” अकुलात रात ते, होत सदा परभात॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि हे प्यारे श्यामसुन्दर! अब तुम्हारा वियोग किसी प्रकार सहा नहीं जाता। विरह की आग ने आँखों के आँसुओं को भी जला डाला है एवं मृत्यु भी विश्वासघात करना चाहती है, अर्थात् अब प्राणों पर आ बीती है। 'प्रियतम अभी आते होंगे,''प्रियतम अब नहीं आयेंगे प्रकार की आशा-निराशा की उलझनों को सुलझाते हुए मुझे एक-एक क्षण कल्प के समान प्रतीत होता है। हम मन और इन्द्रियों से हार गयी हैं। कोई हमारी बात नहीं सुनता। यद्यपि मैं प्रीति की रीति को भली-भौति समझती हूँ फिर भी मेरा हृदय किंचित् भी धैर्य नहीं धारण कर पाता। हे श्यामसुन्दर! तुम्हें जैसे अच्छा लगे वैसा ही करो, किन्तु यह निश्चित समझना कि मेरा एक मात्र नाता तुम्हीं से है और अनन्त काल तक रहेगा। उस विरहिणी की दशा को देखकर समझाते हुए कृपालु कहते हैं कि अरी सखी! तू इतनी अधिक क्यों व्याकुल हो रही है, रात्रि के पश्चात् सदा ही प्रभात हुआ करता है अर्थात् इस विरह अवस्था के बाद मधुर-मिलन का ही आनन्द प्राप्त होगा।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 722-723