# अहो हरि! अब न विरह सहि जात।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0768-M19-K017
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 17
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 361–361

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अहो हरि! अब न विरह सहि जात।  
<a id="line-2"></a>विरहानल दृग-जलहुँ जलायो, लायो मीचहुँ घात।  
<a id="line-3"></a>आस-निरास ग्रंथि निरुबारत, इक पल कलप लखात।  
<a id="line-4"></a>इन मन-इंद्रिन ते हम हारी, कोउ न सुनत इक बात।  
<a id="line-5"></a>यद्यपि समुझत प्रीति-रीति भल, तदपि न धीर बँधात।  
<a id="line-6"></a>जो भावे सो करिय हमारो, एक तुमहिं सों नात।  
<a id="line-7"></a>कत “कृपालु” अकुलात रात ते, होत सदा परभात॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि हे प्यारे श्यामसुन्दर! अब तुम्हारा वियोग किसी प्रकार सहा नहीं जाता। विरह की आग ने आँखों के आँसुओं को भी जला डाला है एवं मृत्यु भी विश्वासघात करना चाहती है, अर्थात् अब प्राणों पर आ बीती है। 'प्रियतम अभी आते होंगे,''प्रियतम अब नहीं आयेंगे प्रकार की आशा-निराशा की उलझनों को सुलझाते हुए मुझे एक-एक क्षण कल्प के समान प्रतीत होता है। हम मन और इन्द्रियों से हार गयी हैं। कोई हमारी बात नहीं सुनता। यद्यपि मैं प्रीति की रीति को भली-भौति समझती हूँ फिर भी मेरा हृदय किंचित् भी धैर्य नहीं धारण कर पाता। हे श्यामसुन्दर! तुम्हें जैसे अच्छा लगे वैसा ही करो, किन्तु यह निश्चित समझना कि मेरा एक मात्र नाता तुम्हीं से है और अनन्त काल तक रहेगा। उस विरहिणी की दशा को देखकर समझाते हुए कृपालु कहते हैं कि अरी सखी! तू इतनी अधिक क्यों व्याकुल हो रही है, रात्रि के पश्चात् सदा ही प्रभात हुआ करता है अर्थात् इस विरह अवस्था के बाद मधुर-मिलन का ही आनन्द प्राप्त होगा।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 722-723

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
