विरह-माधुरी · पद 16
अहो प्राणेश्वर! प्राणाधार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aho prāṇeshvara! prāṇādhāra!
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अहो प्राणेश्वर! प्राणाधार।
2रसिक रँगीलो गुन गर्वीलो, नागर नंदकुमार।
3कासों कहूँ! जाउँ कित? प्रियतम, तुम उर जाननहार।
4इन नैनन कछु सूझत नाहीं, बहत रहत जलधार।
5रहि रहि हिये हूक सी हूलति, भूलति सुधि संसार।
6कैसे प्राण रहत नहिं जानति, जियत मरत शत बार।
7अब “कृपालु” पिय आन मिलो, जनि, इतै निठुरता धार॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि हा प्राणेश्वर! हा प्राणनाथ! हा रसिकशिरोमणि! हा नागर-नन्द-कुमार! तुम्हारे सिवा मैं अपने हृदय की व्यथा किससे कहूँ एवं कहाँ जाऊं? तुम्हारे सिवा मेरे हृदय के भावों को कौन जानता है? हे प्रियतम अब मेरी इन आँखों से संसार का कोई भी तत्व नहीं दिखाई पड़ता, सदा आँसुओं की धारा ही बहती रहती है। थोड़ी थोड़ी देर में रह-रहकर बार-बार मेरे हृदय में तुम्हारे मधुर मिलन की हूक-सी उठ-उठकर सताया करती है जिसके परिणामस्वरूप मुझे संसार की सारी सुधि-बुधि सर्वथा भूल जाती है। हे प्राणनाथ! मेरे शरीर में अभी तक किस प्रकार प्राण विद्यमान हैं, यह मैं स्वयं नहीं बता सकती। हाँ इतना अवश्य जानती हूँ कि मैं दिन भर में सैकड़ों बार जीती और मरती हूँ। 'कृपालु' कहते हैं कि हे अकारण करुण प्रियतम! अब अधिक निष्ठुर मत बनो, शीघ्र ही आकर दर्शन दो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 721-722