लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 15

अरे मन, मोहन सों बचि रहियो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: are mana! mohana soṁ bachi rahiyo

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरे मन, मोहन सों बचि रहियो।

2हित की बात कहहुँ, भूलेहुँ जनि, गैल प्रीति की गहियो।

3छलिया के छल-छंद-फंद-परि, जनि दारुण दुख लहियो।

4निज-वल्लभ इंद्रिन-विषयन सँग, विरहानल जनि दहियो।

5लोक वेद-मर्याद मेटि जनि, प्रेम सिंधु मधि बहियो।

6हम “कृपालु” हैं जग के याते, हमरी लाज निबहियो॥

हिन्दी भावार्थ

अरे मन! श्यामसुन्दर से तुम बचे ही रहना। मैं तुम्हारी भलाई की बात कर रहा हूँ। भूलकर भी प्रेम के मार्ग में मत जाना, अन्यथा उस छलिया के कपरजाल में फंसकर अत्यधिक दुःख का अनुभव करोगे। अरे मन! यदि हमारी बात नहीं मानोगे तो अपनी स्वामिनि इन्द्रियों के विषयों के साथ ही स्वयं भी बिरहानल में जला करोगे तथा लोक एवं वेद की मर्यादाओं को नष्ट करके प्रेम के अगाध समुद्र में वह जाओगे। 'कृपालु अपने मन को समझाते हैं कि देखो मन! हम संसारी हैं इसलिए हमारी लाज बचाना। अर्थात् यदि तुम श्यामसुन्दर के चंगुल में फॅस जाओगे तो हम संसारी न रह सकेंगे।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 720-721