विरह-माधुरी · पद 14
अरी सखि! सिगरो जग बौराई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī sakhi! sigaro jaga baurāī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी सखि! सिगरो जग बौराई।
2तनु जारत जनु अगिनि अंशु-शशि, सब कह शीतलताई।
3विरहिणि-वधू वधत सोइ पातक, हिय कलंक बनि छाई।
4सोइ पातक नित फेंकि गगन-पथ, अस्ताचलहिं गिराई।
5ताही ते शशि चूर चूर ह्वै, तारा बनि बिखराई।
6आवन दे शशि! भानु भोर हीं, देखिहौं तव प्रभुताई।
7यह “कृपालु” "द्विजराज"कहावत, द्विजन विरहिनिनि खाई॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी चन्द्रमा से दुःखी होकर अपनी अन्तरंग सखी से कहती है कि हे प्यारी सखी! यह सारा संसार पागल हो गया है, क्योंकि चन्द्रमा की किरणें प्रत्यक्ष रूप से मुझे अग्नि के समान जला रही हैं, फिर भी संसार के लोग चन्द्रमा को शीतल कहते हैं। अरी सखी! चन्द्रमा के बीच में जो तू काला-काला धब्बा देखती है, यह विरहिणियों की हत्या करने का पाप ही कलंक बनकर दिखाई पड़ रहा है एवं वही हत्या प्रतिदिन चन्द्रमा को आकाश मार्ग से अस्ताचल पहाड़ पर पटकती हैं जिससे चन्द्रमा के अनेकानेक टुकड़े हो जाते हैं। वे ही टुकड़े बिखर कर रात को तारों के रूप में आकाश में दिखाई पड़ते हैं। अरे दुष्ट चन्द्रमा प्रात:काल सूर्य को आने दे तो मैं देखूँगी कि तुझमें कितनी शक्ति है? 'कृपालु' कहते हैं कि इस चन्द्रमा को शास्त्रं ने द्विजराज अर्थात् ब्राह्मणों का राजा बतलाया है, किन्तु मेरे मन में तो उसका नाम द्विजराज इसलिए पड़ा है कि वह द्विज अर्थात् दाँतों से (किरणों से) राज अर्थात् विरहिणी को चबाया करता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 719-720