विरह-माधुरी · पद 13
अरी सखि! मन मेरो कहुँ जात।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī sakhi! mana mero kahuṁ jāta
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी सखि! मन मेरो कहुँ जात।
2मैं मति की भोरी अति मोते, दृग मिलाय किय घात।
3श्याम-सलोना टोना करि गयो, लगी दृगन बरसात।
4मधुर-वेदना हिय बिच पुनि पुनि, विरह करेजो खात।
5सुरति बिसूरत सब दिन बीतत, करवट बदलत रात।
6यह “कृपालु” नहिं कहन सुनन की, समुझ प्रीति की बात॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी सखी! मेरा मन न जाने कहाँ जा रहा है। मैं अत्यन्त ही भोली-भाली हूँ, प्यारे श्यामसुन्दर ने आँखों को मिलाकर मेरे साथ विश्वासघात किया। वह मेरे ऊपर कुछ टोना-सा कर गया, इसके परिणाम स्वरूप मेरी आँखों से सावन की झड़ी लगी हुई है। मेरे हृदय में बार बार मीठी-सी पीड़ा होती है एवं विरह मानो मेरा हृदय निकाले लिये जाता है। प्यारे श्यामसुन्दर की रूपमाधुरी का स्मरण करते-करते ही सारा दिन बीत जाता है एवं रात भर करवटें बदलती हुई जागती रहती हुँ। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी सखी! यह प्रियतम की प्रीति की बात है, अतएव इसे अब किसी से मत कहना, यह नितांत गोपनीय है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 719