विरह-माधुरी · पद 12
अरी सखि!, मति तोरी भरमाई।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī sakhi!, mati torī bharamāī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी सखि!, मति तोरी भरमाई।
2तेरी सौंह साँचु शशि-किरनन, नेकु न ताप लखाई।
3श्रुति प्रमाण ते श्रेष्ठ कहत सब, बुध अनुभवहिं सदाई।
4कहा सोच! तव रोम रोम महँ, प्रियतम रह्यो समाई।
5ये दोउ नैन नेकु नहिं मानत, कोटि भाँति समुझाई।
6तजु सखि! वैरिणि प्रीति नाहिं तो, तोर प्राण लै जाई।
7तू “कृपालु” अनजान, लगी नहिं, छूटति कोटि उपाई॥
हिन्दी भावार्थ
(एक विरहिणी से उसकी अन्तरंग सखी का वाद विरहिणी से उसकी अन्तरंग सखी कहती है कि अरी सखि! तू पागल मत बन तुझे व्यर्थ ही भ्रम हो रहा है। मैं तेरी शपथ खाकर सत्य कहती हूँ कि चन्द्रमा की किरणों में किंचित् भी ताप नहीं है वरन् वह तो अत्यन्त शीतलता प्रदान करने वाला है। विरहिणी उत्तर देती है कि अरी सखी! सुने हुए अथवा वेदों के प्रमाण से भी श्रेष्ठ प्रमाण बुद्धिमान लोग अनुभव को बताते हैं। तात्पर्य यह है कि तेरी कही हुई बात तो श्रुति प्रमाण है किन्तु मेरे ऊपर बीती हुई बात प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाण है फिर मैं तेरी बात कैसे मानूँ। फिर विरहिणी से उसकी सखि कहती है कि क्यों री! तू तो कहती है कि मेरा प्रियतम मेरे रोम-रोम में समाया हुआ है फिर तू इतनी चिन्तित क्यों है? विरहिणी उत्तर देती है कि अरी सखि! मैं स्वयं प्रियतम को नहीं चाहती किन्तु इन हठीली आँखों को कैसे समझाऊँ, यह किसी प्रकार नहीं समझतीं। फिर सखी विरहिणी से कहती है कि तू इस वैरिणि प्रीति को ही छोड़ दे, नहीं तो वह तेरा प्राण ही लेकर मानेगी। तब विरहिणी की ओर से 'कृपालु'उत्तर देते हैं कि अरी भोली-भाली सखी! तू प्रीति के विषय में अभी सर्वथा अज्ञ है। लगी हुई प्रीति करोड़ों उपायों से भी नहीं छूटती, इसका अनुभव केवल प्रेमिका को ही होता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 717-718