विरह-माधुरी · पद 11
अरी सखि!, प्रीति न करियो कोय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī sakhi!, prīti na kariyo koya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी सखि!, प्रीति न करियो कोय।
2प्रीति करत दुख होत सखी! अस, जस मरतहुँ नहिं होय।
3पुनि मारति पुनि वाय जियावति, प्रीति कहावति सोय।
4दिन नहिं चैन एक छिन कहँ कहुँ, रैन गँवावति रोय।
5लौकिक वैदिक मर्यादहिं सखि! प्रीति पलक महँ धोय।
6कह “कृपालु” तजु प्रीति जान तब, प्रीति न भावे तोय॥
हिन्दी भावार्थ
श्यामसुन्दर के वियोग में झुंझलाई हुई एक गोपी कहती है-अरी सखि! श्यामसुन्दर से कोई भी प्रेम मत करना। प्रेम करने में इतना दुःख होता है जितना दुःख मरते समय भी नहीं होता। प्रेमी लोग प्रेम की परिभाषा करते हैं कि जो बार बार मार डाले एवं पुन: बार-बार जीवित कर दे, वही प्रेम है। प्रेम करने पर दिन भर बेचैन रहना पड़ता है एवं रात भर रोना पड़ता है, तथा लौकिक-वैदिक मर्यादाओं को यह प्रेम आँसुओं द्वारा धो डालता है अर्थात् समाप्त कर देता है। इतने में 'कृपालु ने कहा ''अरी सखि। तू प्रेम की निन्दा करती है, यह अभिनय मात्र है। मैं सच तो तब मानूँ जब तू स्वयं प्रेम के विपरीत प्रबचन देने के बजाय प्रेम करना बन्द कर दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 717