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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 10

अरी सखि!, प्राण कंठ चलि आय।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī sakhi!, prāṇa kaṇṭha chali āya

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरी सखि!, प्राण कंठ चलि आय।

2अब तो जीवन-धन बिनु जीवन, कैसेहुँ रहि न सकाय।

3उचकति चौंकति बकति तकति कछु, पुनि पुनि मुर्छा आय।

4ऐसी हूक उठति हिय पुनि-पुनि, मनहुँ प्राण अब जाय।

5है कोउ प्राणसखी लै प्राणन, प्राणनाथ मिलवाय।

6अब “कृपालु” पिय आन मिलो न तु, होइहिं तोरि हँसाय॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अब तो प्रियतम के वियोग में प्राण निकलना चाहते हैं। तू ही बता, जीवनधन के बिना यह जीवन किस प्रकार रह सकता है। मैं उन्मादिनी की भाति कभी चौंकने लगती हूँ, कभी बकने लगती हूँ, कभी एकटक कुछ देखने लगती हूँ एवं कभी मूर्च्छित हो जाती हूँ। अरी सखि! हृदय में इतनी तीव्र हूक उठती है कि मानो इसी क्षण प्राण निकल जायेंगे। क्या मेरी ऐसी कोई हितैषिणी सखि है, जो मेरे प्राणों को भी लेकर एक बार प्राणनाथ से मिला दे? इतने में कृपालु' ने कहा-हे प्रियतम श्यामसुन्दर! अब शीघ्र ही इस विरहिणी से मिल लो अन्यथा तुम्हारी अकारण-करूणा की उपाधि की संसार हँसी उडायेगा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 716