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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 9

अरी सखि!, पिय सँग नींद गई।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī sakhi!, piya saṁga nīṁda gaī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अरी सखि!, पिय सँग नींद गई।

2दे कोउ लाय मनाय हाय! यह, कैसी भई दई।

3कहति नींद इक रात सखी! तोहिं, हौं निज गोद लई।

4आये पिय फिरि गये तबहीं तू, गारी मोहिं दई।

5अब जब लौं पिय रह, हौं नहिं रह, यह हौं उरहिं ठई।

6दैव “कृपालु” दुर्बलहिं घातक, दै नित विपति नई॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-'अरी सखी! श्यामसुन्दर के साथ-साथ नींद भी रूठ गई है। हाय दैया! क्या हो गया है? कोई तो उस नींद को बुला दे जिससे स्वप्न में ही प्रियतम से मिलन हो जाय''। उस रात की याद कर जब मैं तुझे गोद में लेकर बड़े दुलार रे सुला रही थी। और वापस लौट गये थे। अरी निगोड़ी नींद! तेरे कारण ही प्रियतम के मिलन में बाध हुई'। अतएव अब जब तक तेरे हृदय में तेरे प्रियतम रहेंगे तब तक मैं नहीं आऊँगी, यह मैंने प्रतिज्ञा कर ली है''। ने कहा यह लौकिक कहावत उपयुक्त ही है कि दैव दुर्बल का ही घातक होता हैं और नवीन विपत्ति भी देता है। भावार्थ यह है कि प्रियतम के वियोग के दुःख के साथ नींद के वियोग का दुःख भी उठाना पड़ रहा है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 715-716