विरह-माधुरी · पद 8
अरी मैं, मरी हरी बिनु हाय।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī! maiṁ, marī harī binu hāya
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी मैं, मरी हरी बिनु हाय।
2विरह न रहन देत अब प्रानन, कोउ बचावहु धाय।
3बिनुहिं अनल हौं जरी जात हौं, रहे नैन झरि लाय।
4कहा करूँ? कित जाऊँ? एक छिन, उन बिनु रह्यो न जाय।
5तुम प्राणन-ईश्वर प्राणेश्वर!, पुनि कत बेर लगाय।
6अब “कृपालु” पिय बेगि मिलहु न तु, हौं ही मिलिहौं आय॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी दैया! प्यारे श्यामसुन्दर के बिना मेरा तो प्राण निकला जा रहा है। विरह अब प्राणों को लेकर ही मानेगा। हाय! हाय!! कोई तो दौड़ कर मुझे बचाओ। बिना आग के ही मैं जली जा रही हूँ एवं उससे बचने के लिये आँखों से आँसू की वर्षा भी कर रही हूँ। हाय! मैं क्या करूँ? कहाँ चली जाऊँ मुझसे श्यामसुन्दर के बिना तो एक क्षण भी रहा नहीं जाता। हे प्राणेश्वर! तुम मेरे प्राणों के स्वामी होते हुए भी इतनी देर क्यों लगा रहे हो? 'कृपालु' कहते हैं कि अब शीघ्र ही दर्शन दे दो, नहीं तो प्राण निकल जाने पर मैं स्वयं ही आकर मिल जाऊँगी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 714-715