विरह-माधुरी · पद 7
अरी तोय कहा भयो!"कछु नाहिं"।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī toya kahā bhayo? ‘kachhu nāhiṁ’
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी तोय कहा भयो!"कछु नाहिं"।
2कहा बिसूरति बैठी मौन गहि?"ब्रह्म-रूप निज काहिं"।
3कत तनु कंप?"डरी सखि सोचत, नरक दुखन मन माहिं"।
4कत रोवति?"रोवति नहिं दोउ दृग, आनँद-जल बरसाहिं"।
5कत दीरघ निःश्वास?"सिखत सखि! प्राणायाम सदाहिं"।
6कत पुनि पुनि मुर्छित? "सखि सो तो, ब्रह्म-समाधि समाहिं"।
7प्रीति दुरावति किमि “कृपालु” सखि! तेहि मग, बुध नहिं जाहिं॥
हिन्दी भावार्थ
(एक विरहिणी सखी के प्रेम के रहस्य को जानने के लिए उसकी अन्तरंग सखी प्रश्न करती है एवं विरहिर्ण प्रेम को छिपाती हुई बातें बनाती है।) सखी ने पूछा कि अरी! तुझे क्या हो गया है? विरहिणी न कहा "कुछ भी तो नहीं।'फिर सखी ने पूछा, 'तू एकान्त में बैठी उदासीन-भाव से क्या सोचा करती है?"विरहिणी ने कहा, "मैं ज्ञान मार्ग के अनुसार अपने-ब्रह्म-स्वरूप का चिन्तन करती हूँ।'सखी ने पूछा, तेरा शरीर क्यों काँपता है? विरहिणी ने कहा, 'नरक के घोर दुःखों का चिन्तन करके मैं कभी-कभी डर जाती हूँ।'सखी ने पूछा 'तू रोती क्यों है? विरहिणी ने कहा, "मैं रोती नहीं, यह तो ब्रह्मानन्द का जल आँखों से गिरने लगता है।'सखी ने कहा तू लम्बी-लम्बी साँसे क्यों लेती है?'विरहिणी ने कहा, 'मैं इन्द्रियों को वश में करने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करती हूँ।'सखी ने पूछा तू बार-बार मूर्च्छित क्यों हो जाती है?'विरहिणी ने कहा, सो तो मैं समाधि में लीन हो जाती हूँ।'"कृपालु' कहते हैं कि अरी विरहिणी! तू इतनी बातें बनाकर श्यामसुन्दर के प्रेम को क्यों छिपा रही है? हम स्वयं ही प्रेम मार्ग में जाना पसन्द नहीं करतीं!
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 713-714