# अरी तोय कहा भयो!"कछु नाहिं"।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0758-M19-K007
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 7
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 357–357

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अरी तोय कहा भयो!"कछु नाहिं"।  
<a id="line-2"></a>कहा बिसूरति बैठी मौन गहि?"ब्रह्म-रूप निज काहिं"।  
<a id="line-3"></a>कत तनु कंप?"डरी सखि सोचत, नरक दुखन मन माहिं"।  
<a id="line-4"></a>कत रोवति?"रोवति नहिं दोउ दृग, आनँद-जल बरसाहिं"।  
<a id="line-5"></a>कत दीरघ निःश्वास?"सिखत सखि! प्राणायाम सदाहिं"।  
<a id="line-6"></a>कत पुनि पुनि मुर्छित? "सखि सो तो, ब्रह्म-समाधि समाहिं"।  
<a id="line-7"></a>प्रीति दुरावति किमि “कृपालु” सखि! तेहि मग, बुध नहिं जाहिं॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक विरहिणी सखी के प्रेम के रहस्य को जानने के लिए उसकी अन्तरंग सखी प्रश्न करती है एवं विरहिर्ण प्रेम को छिपाती हुई बातें बनाती है।) सखी ने पूछा कि अरी! तुझे क्या हो गया है? विरहिणी न कहा "कुछ भी तो नहीं।'फिर सखी ने पूछा, 'तू एकान्त में बैठी उदासीन-भाव से क्या सोचा करती है?"विरहिणी ने कहा, "मैं ज्ञान मार्ग के अनुसार अपने-ब्रह्म-स्वरूप का चिन्तन करती हूँ।'सखी ने पूछा, तेरा शरीर क्यों काँपता है? विरहिणी ने कहा, 'नरक के घोर दुःखों का चिन्तन करके मैं कभी-कभी डर जाती हूँ।'सखी ने पूछा 'तू रोती क्यों है? विरहिणी ने कहा, "मैं रोती नहीं, यह तो ब्रह्मानन्द का जल आँखों से गिरने लगता है।'सखी ने कहा तू लम्बी-लम्बी साँसे क्यों लेती है?'विरहिणी ने कहा, 'मैं इन्द्रियों को वश में करने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करती हूँ।'सखी ने पूछा तू बार-बार मूर्च्छित क्यों हो जाती है?'विरहिणी ने कहा, सो तो मैं समाधि में लीन हो जाती हूँ।'"कृपालु' कहते हैं कि अरी विरहिणी! तू इतनी बातें बनाकर श्यामसुन्दर के प्रेम को क्यों छिपा रही है? हम स्वयं ही प्रेम मार्ग में जाना पसन्द नहीं करतीं!

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 713-714

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
