विरह-माधुरी · पद 6
अरी! कोउ विरहिनि बाट बतावे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī! kou birahini bāṭa batāve
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी! कोउ विरहिनि बाट बतावे।
2लखी रीत विपरीत प्रीत की, कहि न जाय सहि जावे।
3इत विरहानल जारत सखि! उत, मधुर-मिलन मन भावे।
4इत चह सपनेहिं श्याम-मिलन, उत, चिंता सवति जगावे।
5इत चह जान प्राण निज तनु तजि, उत दृग रोकन धावे।
6इत चह तजन प्रीति विष बेलरि, उत आशा रजु लावे।
7गति “कृपालु” लखि साँप-छछूँदरि, ज्ञानिहुँ ज्ञान भुलावे॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी अपनी अन्तरंग सखी से कहती है के अरी सखि! मुझ विरहिणी को कोई मार्ग बता दे, क्योंकि रे लिए दोनों ही ओर खाई दिखाई पड़ती है। अरी सखि! की बड़ी ही उल्टी रीति है जो कि कहते नहीं बनती, बस नहते ही बनती है। इधर तो विरह की आग मुझे जलाती है एवं उधर मेरे मन को प्रियतम का मधुर-मिलन भाता है। करूँ? अरी सखि! इधर तो मैं चाहती हूँ कि मुझे नींद आ जाय एवं मैं स्वप्न-में ही प्रियतम से मिल लूँ, तो उधर चिन्ता सौत बनकर जगाती रहती है। दूँ तो इधर आँखें अपने स्वार्थ के लिये मुझे ऐसा करने से रोक देती हैं। फिर मैं चाहती हूँ कि इस प्रीति की विष की लता को भी छोड़ दूँ, पर इधर तत्क्षण ही "प्रियतम आयेंगे! मुझे ऐसा करने नहीं देती। साँप-छछुँदर सरीखी है, अर्थात् दोनों ही प्रकार विपत्ति है। अवस्था को देखकर उद्धव आदि ज्ञानी लोग भी अपना ज्ञान भूल जाते हैं, फिर मार्ग कौन बताये?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 712-713