विरह-माधुरी · पद 5
अरी कोउ, उर उरझी सुरझावे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: arī! kou, ura urajhī surajhāve
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अरी कोउ, उर उरझी सुरझावे।
2ज्यों ज्यों जतन करत सुरझन को, त्यों त्यों अति उरझावे।
3फाँसी भई दृगन की हाँसी, अब सोउ दृग झरि लावे।
4मनहूँ जाय मिल्यो उनहिंन सँग, बुधि निज सुधि बिसरावे।
5मोहिं अकेली जानि सहेली, विरह अनल धधकावे।
6दीरघ श्वास-धूम-दृग-वारिद, कहँ लौं जल बरसावे।
7बड़ कलंक सखि! अंक प्रेम पट, जो निज प्राण गँवावे।
8अब “कृपालु” निज सिर धरि ओखलि, चोट ते कस घबरावे॥
हिन्दी भावार्थ
विरहिणी कहती है कि अरी सखि! मेरे हृदय में प्रियतम श्यामसुन्दर के मधुर-मिलन को उलझन को दया करके कोई सुलझा दे। मैं तो जितना ही इस उलझन को (प्रियतम स्मरण को) सुलझाती हूँ अर्थात् भुलाना चाहती हूँ उतना ही अधिक वह और उलझती जाती है, अर्थात् उतनी अधिक उनकी याद आती है। अरी सखि! आँखों की थोड़ी सी हँसी भी मेरे गले की फाँसी बन गयी है। अब वे आँखें भी के मधुर-मिलन के लिए तड़प रही हैं। मेरा मन भी प्रियतम से ही जा मिला एवं मेरी बुद्धि भी अपनी सुधि-बुधि खो बैठी तथा प्रेम विभोर हो गई। अतः मुझे अकेली समझ कर विरह ने मेरे अन्दर आग लगा दी। यद्यपि मैंने इस आग को बुझाने के लिए लम्बी-लम्बी साँसों की भाप को आँखों में बादल बनाकर उनसे निरन्तर ही जल बरसाया फिर भी आग नहीं बुझी। अरी सखि! यदि प्राण भी छोड़ देती हूँ तो प्रेम के उज्ज्वल वस्त्र पर महान् कलंक लग जाता है, क्योंकि प्रेम तो अमरत्व प्रदान करने वाला कहलाता है। अतएव अब तड्पने के सिवा दूसरा कोई चारा ही नहीं। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी विरहिणी! जब ओखली में सिर रख दिया तब चोटों से क्या घबराना।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 711-712