विरह-माधुरी · पद 4
अब रही न काहू काम की।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aba rahī na kāhū kāma kī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अब रही न काहू काम की।
2जब ते लखी,सखी! मन मोहन, मनमोहिनि छवि श्याम की।
3तब ते भई श्याम की, वानेइ, मोल लई बिनु दाम की।
4अब तो इन नैनन, मन महँ इक, सुरति बसी सुखधाम की।
5लोक वेद की गैल चलूँ कत, ह्वै गइ हौं बिनु पाम की।
6धरु “कृपालु” अब धीर सखी! कोउ, गति न जान विधि वाम की।।
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि अरी सखि! मैं अब किसी काम की न रही। जब से मन मोहन श्यामसुन्दर की मन मोहिनी छवि देखी है तब से उन्हीं के हाथ बिना मोल के बिक गयी हुँ। अब तो इन आँखों एवं मन में एकमात्र उन्हीं की साँवरी सूरत समायी हुई है। अरी सखि! अब लोक वेद की मर्यादाओं का पालन किस प्रकार करूँ जब कि मन बुद्धि मेरे हाथ में हैं ही नहीं। 'कृपालु' कहते हैं अरी सखि! धैर्य धारण कर। विधाता की विपरीत गति को कौन समझता है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 710-711