विरह-माधुरी · पद 3
अँखियाँ, सखि! या रूप लुभानी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aṁkhiyāṁ, sakhi! yā rūpa lubhānī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अँखियाँ, सखि! या रूप लुभानी।
2देखन चहत कमल दल लोचन, सुनन चहत मृदुबानी।
3हौं समुझावत हारि थकी पै, इन ने एक न मानी।
4नहिं सूखत एकहुँ छिन कहँ सखि! इन अँखियन को पानी।
5तजि दीनी तृन सम इन निगुरिन, लोक-लाज,कुल-कानी।
6जो “कृपालु” होनी थी हो गइ, अब का होनी जानी॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! श्यामसुन्दर के सुन्दर रूप पर मोहित हो गयी हैं. हैं, अब तो सखि! ये केवल श्यामसुन्दर को ही देखना हैं। की देखा-देखी कान भी, एक मात्र श्यामसुन्दर की ही मधुर वाणी सुनमा चाहते हैं मैंने अनेक प्रकार से इन आँखों को समझाया किन्तु इन्होंने मेरी एक भी नहीं मानी इन आँखों के आँसू एक क्षण के लिये भी नहीं बन्द होते ईनहोंने अनादिकालीन लोक एवं कुल की लज्जा को तृण के समान त्याग दिया अब मैं क्या करूँ? इतने में 'कृपालु' ने कहा-अरी सखि! था सो हो गया, अब कुछ नहीं हो सकता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 710