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RADHEY RADHEY

विरह-माधुरी · पद 2

अँखियाँ, श्याम-प्रेम-रस माती।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aṁkhiyāṁ, shyāma-prema-rasa-mātī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1अँखियाँ, श्याम-प्रेम-रस माती।

2जब ते लखी नंदनंदन छवि, मंद मंद मुसकाती।

3तब ते इक पल कहँ नहिं कल सखि, तलफति हौं दिनराती।

4ये निगुरी समुझति नहिं यद्यपि, समुझावति बहु भाँती।

5करि-करि सुरति साँवरिहिं सूरति, भरि अँसुवन झरि लाती।

6खारी लग बैकुण्ठ-विभूतिहुँ, मुक्ति हुँ नाहिं सुहाती।

7हौं “कृपालु” अब हारि गई सखि!, तू ही कछु समुझाती॥

हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है-अरी सखि! मेरी आँखें श्यामसुन्दर की प्रेम-रस-मदिरा में पग गयी हैं। जब से नन्दनन्दन की मंद-मंद मुस्कराती हुई छवि देखी है तब से एक पल को भी चैन नहीं है। दिन-रात तड्पती रहती हूँ। इन निगोड़ी आँखों को अनेक प्रकार से समझाती हूँ कि न्तु फिर भी नहीं समझतीं। उसी साँवरी सूरति की याद कर-करके निरंतर आँसुओं की झड़ी लगा रही हैं। अरी सखि! अब तो बैकुण्ठ का ऐश्वर्य भी खारा लगता है एवं मुक्ति भी अच्छी नहीं लगती। 'कृपालु' के शब्दों में अब तो मैं हार गई, सखि तू ही इन आँखों को समझा।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 709