विरह-माधुरी · पद 1
अँखियाँ झर-झर लागीं बरसन।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: aṁkhiyāṁ jhara-jhara lāgīṁ barasana
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1अँखियाँ झर-झर लागीं बरसन।
2पल छिन कैसेहुँ कल न पिया बिनु,
3जाय कहो कोउ श्याम-सुँदर सन।
4उठति करेजे हूक छिनहिं छिन,
5पिय हिय तरस न, हम लागीं तरसन।
6परसों आवन कहि गये अबहूँ,
7आये न, बीत गये सखि बरसन।
8प्रान पयान करत नहिं, नैनन,
9यह आशा"पिय देइहैं दरसन"।
10अब “कृपालु” भरि अंक मिलो, या,
11निज-कर देहु चलाय सुदर्शन॥
हिन्दी भावार्थ
एक विरहिणी कहती है कि प्रियतम के मधुर-मिलन के निमित्त मेरी आँखें झर-झर आँसू बरसा रही हैं। कोई जाकर प्रियतम से यह कह दे कि उनके बिना अब एक पल को भी चैन नहीं है। हृदय में बार-बार हूक-सी उठा करती है। हमारे प्रकार तरसते हुए भी प्रियतम के हृदय में दया नहीं आती। परसों आने के लिए कह गये थे किन्तु बरसों बीत गये अभी तक नहीं आये। प्राण निकलना चाहते हैं किन्तु आँखों की यह आशा कि वे मिलेंगे, नहीं निकलने देती। 'कृपालु' कहते हैं कि अब या तो आकर मुझे अपने गले से लगा लो, या अपने ही हाथों से सुदर्शन चक्र चलाकर मुझे मार डालो, अब तुम्हारा वियोग सहा नहीं जाता।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 708-709