# अँखियाँ झर-झर लागीं बरसन।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0752-M19-K001
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: विरह-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 1
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 354–354

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>अँखियाँ झर-झर लागीं बरसन।  
<a id="line-2"></a>पल छिन कैसेहुँ कल न पिया बिनु,  
<a id="line-3"></a>जाय कहो कोउ श्याम-सुँदर सन।  
<a id="line-4"></a>उठति करेजे हूक छिनहिं छिन,  
<a id="line-5"></a>पिय हिय तरस न, हम लागीं तरसन।  
<a id="line-6"></a>परसों आवन कहि गये अबहूँ,  
<a id="line-7"></a>आये न, बीत गये सखि बरसन।  
<a id="line-8"></a>प्रान पयान करत नहिं, नैनन,  
<a id="line-9"></a>यह आशा"पिय देइहैं दरसन"।  
<a id="line-10"></a>अब “कृपालु” भरि अंक मिलो, या,  
<a id="line-11"></a>निज-कर देहु चलाय सुदर्शन॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

एक विरहिणी कहती है कि प्रियतम के मधुर-मिलन के निमित्त मेरी आँखें झर-झर आँसू बरसा रही हैं। कोई जाकर प्रियतम से यह कह दे कि उनके बिना अब एक पल को भी चैन नहीं है। हृदय में बार-बार हूक-सी उठा करती है। हमारे प्रकार तरसते हुए भी प्रियतम के हृदय में दया नहीं आती। परसों आने के लिए कह गये थे किन्तु बरसों बीत गये अभी तक नहीं आये। प्राण निकलना चाहते हैं किन्तु आँखों की यह आशा कि वे मिलेंगे, नहीं निकलने देती। 'कृपालु' कहते हैं कि अब या तो आकर मुझे अपने गले से लगा लो, या अपने ही हाथों से सुदर्शन चक्र चलाकर मुझे मार डालो, अब तुम्हारा वियोग सहा नहीं जाता।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 708-709

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
