होरी-माधुरी · पद 30
होरी में, हारे हरि हो री।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: horī meṁ, hāre hari ho rī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1होरी में, हारे हरि हो री।
2भागे हरि आगे, सखि परिकर, घेरि पकरि लइ बरजोरी।
3बांधि श्याम ल्याई श्यामा ढिग, करि जयकार लली को री।
4वेणी गूँथि, माँग भरि सेंदुर, दियो भाल बिंदी रोरी।
5उर कंचुकि, नासा नथ बेसर, चुनरी शीश अतर बोरी।
6कर मेंहँदी, पग सुघर मिहावरि, बिछुवनि छवि अँगुरिन पोरी।
7करि सोरह श्रृंगार श्याम भये, मनहुँ साँचु श्यामा गोरी।
8ललितादिक ढप ढोल बजावति, नाचत हरि गहवर खोरी।
9तन, मन, प्राण “कृपालु” लुटावत, पूछत,"तू काकी छोरी"॥
हिन्दी भावार्थ
होली के खेल में श्यामसुन्दर हार गये। हार कर श्यामसुन्दर भागे। सखियों ने दौड़ कर आगे से श्यामसुन्दर को जबर्दस्ती पकड़ लिया एवं उन्हें बध कर लली की जय जयकार बोलते हुए भानुलली के सामने ले गयीं। लली के संकेतानुसार सखियों ने श्यामसुन्दर की वेणी गूँथ कर उनकी माँग में सेंदुर भर दिया एवं भाल पर रोली की लाल बिन्दी लगा दी। वक्षस्थल पर कंचुको, मासिका में नथ एवं बेसर एवं सिर पर अतर से बोरी हुई चुनरी उढ़ा दी। अँगुलियों में बिछुओं की झाकी का क्या कहना है! इस प्रकार सोलहों शृंगार किये हुए श्यामसुन्दर सचमुच ही मानो श्यामा सुन्दरी प्रतीत होने लगे। तत्पश्चात् ललितादिक सखियों ने ढप और ढोल बजाना प्रारम्भ किया एवं गह्वर चन की गलियों में श्यामसुन्दर घुँघट काढ़ कर नाचने लगे। 'कृपालु' ने इस झाँकी पर अपने तन, मन, प्राण को लुरा दिया एवं सखियों के सामने श्यामसुन्दर को सुनाते हुए पूछा, अरी श्यामा! तू बड़ी सुन्दर नाचती है, तू किसकी छोरी है?
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 706