# होरी में, हारे हरि हो री।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0751-M18-K030
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: होरी-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 30
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 353–353

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>होरी में, हारे हरि हो री।  
<a id="line-2"></a>भागे हरि आगे, सखि परिकर, घेरि पकरि लइ बरजोरी।  
<a id="line-3"></a>बांधि श्याम ल्याई श्यामा ढिग, करि जयकार लली को री।  
<a id="line-4"></a>वेणी गूँथि, माँग भरि सेंदुर, दियो भाल बिंदी रोरी।  
<a id="line-5"></a>उर कंचुकि, नासा नथ बेसर, चुनरी शीश अतर बोरी।  
<a id="line-6"></a>कर मेंहँदी, पग सुघर मिहावरि, बिछुवनि छवि अँगुरिन पोरी।  
<a id="line-7"></a>करि सोरह श्रृंगार श्याम भये, मनहुँ साँचु श्यामा गोरी।  
<a id="line-8"></a>ललितादिक ढप ढोल बजावति, नाचत हरि गहवर खोरी।  
<a id="line-9"></a>तन, मन, प्राण “कृपालु” लुटावत, पूछत,"तू काकी छोरी"॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

होली के खेल में श्यामसुन्दर हार गये। हार कर श्यामसुन्दर भागे। सखियों ने दौड़ कर आगे से श्यामसुन्दर को जबर्दस्ती पकड़ लिया एवं उन्हें बध कर लली की जय जयकार बोलते हुए भानुलली के सामने ले गयीं। लली के संकेतानुसार सखियों ने श्यामसुन्दर की वेणी गूँथ कर उनकी माँग में सेंदुर भर दिया एवं भाल पर रोली की लाल बिन्दी लगा दी। वक्षस्थल पर कंचुको, मासिका में नथ एवं बेसर एवं सिर पर अतर से बोरी हुई चुनरी उढ़ा दी। अँगुलियों में बिछुओं की झाकी का क्या कहना है! इस प्रकार सोलहों शृंगार किये हुए श्यामसुन्दर सचमुच ही मानो श्यामा सुन्दरी प्रतीत होने लगे। तत्पश्चात् ललितादिक सखियों ने ढप और ढोल बजाना प्रारम्भ किया एवं गह्वर चन की गलियों में श्यामसुन्दर घुँघट काढ़ कर नाचने लगे। 'कृपालु' ने इस झाँकी पर अपने तन, मन, प्राण को लुरा दिया एवं सखियों के सामने श्यामसुन्दर को सुनाते हुए पूछा, अरी श्यामा! तू बड़ी सुन्दर नाचती है, तू किसकी छोरी है?

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 706

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
