होरी-माधुरी · पद 29
होरी खेलो री, छैल सँग रँग घोरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: horī khelo rī, chhaila saṁga raṁga ghorī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1होरी खेलो री, छैल सँग रँग घोरी।
2रंग बिरंग रंग लै संगहिं, अंग अंग करु सरबोरी।
3आजु बनाय देउ याय विधि सों, मिलि अलि, गाल रँगो रोरी।
4सखि कोउ छोरि लेहु पीतांबर, कोउ लेहु मुरली छोरी।
5"होरी है","होरी है","होरी है, कहि कहि, सब लालहिं ललकारो री।
6जो “कृपालु” हरि तबहुँ न हारे, नैन बान मारहु गोरी॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखी होली के अवसर पर अपनी अन्तरंग सखियों से कहती है कि चलो रंग घोल कर श्यामसुन्दर के साथ होली खेलें। सब लोग एक साथ ही रंग-बिरंगे रंगों को लेकर उनके अंग अंग को सराबोर कर दो। आज सब लोग मिल कर श्यामसुन्दर की अच्छी प्रकार गति बना दो एवं गाल में भली भाति खूब रोली मल दो, कोई सखी पीताम्बर छीन लो एवं कोई मुरली छीन लो।''होरी है,''होरी है,'होरी है? उच्च स्वर से ऐसा कह-कह कर, सब मिलकर एक साथ ही लाल को ललकार दो। 'कृपालु'सखियों को परामर्श देते हैं कि यदि इतने पर भी श्यामसुन्दर न हारं तो नैनों के बाणों से उन पर प्रहार करो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 705