होरी-माधुरी · पद 28
होरी खेलो न, श्याम सँग कोउ गोरी।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: horī khelo na, shyāma saṁga kou gorī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1होरी खेलो न, श्याम सँग कोउ गोरी।
2होरी खेलन मिस सखियन सों, करत फिरत नित बरजोरी।
3निधरक कहत"हमारी प्यारी, मोते लेहु नात जोरी"।
4नटखट झपटि खोलि घूँघट पट, मलत गुलाल गाल रोरी।
5सब सोँ कहत"नेकु चलु कुंजनि", तकि उर मार सैन को री।
6बात बनावति किमि “कृपालु” सखि!, मन चाहत चोरी-चोरी॥
हिन्दी भावार्थ
होली के अवसर पर श्यामसुन्दर के ऊधम से सखियों को सावधान करती हुई एक सखी कहती है कि अरी सखियों! श्यामसुन्दर के साथ कोई भी होली मत खेलो क्योंकि होली खेलने के बहाने वह सखियों के साथ अनेक प्रकार के अड़बंग व्यवहार करता है। वह निर्भयतापूर्वक प्रत्येक से "हमारी प्यारी ऐसा कहता है और यह भी कहता है कि तुम मेरे साथ पति का सम्बन्ध स्थापित कर लो। वह नटखट बेधड़क झपट कर घुँघट खोलकर, गालों में गुलाल मल देता है। कहाँ तक कहें वह निर्लज्ज सभी से यह कहता है कि जरा कुंज में चलो। साथ ही नैनों के कटाक्ष बाण से हृदय के भीतर प्रहार भी करता कृपालु'इस सखी से कहते हैं कि अरी सखी! तू अन्य सखियों को पट्टी पढ़ा रही है! मैं भली भाँति जानता हूँ कि तू श्यामसुन्दर से चोरी-चोरी प्यार करती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 704-705