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RADHEY RADHEY

होरी-माधुरी · पद 27

होरी आई री, अरी वो नथवारी।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: horī āī rī, arī vo nathavārī

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1होरी आई री, अरी वो नथवारी।

2घुँघट के पट खोलि खेलि ले, लै प्यारी! कर पिचकारी।

3बहुत दिनन ते कहति रही तू, होरी आवति बनवारी।

4जो तोय डर गुरुजन को तो चलु, जमुना पार उतर प्यारी।

5जो तोय डर मोहूँ ते कछु तो, सँग लै चलु सखियन सारी।

6मनभाई “कृपालु” करि ले तू, यह तेरो पिय गिरिधारी॥

हिन्दी भावार्थ

होली के अवसर पर श्यामसुन्दर एक सखी से कहते हैं कि अरी नथवारी सखी! होली आयी है। हे प्यारी! कु के पट खोलकर, हाथ में पिचकारी लेकर जी भर कर होली खेल ले। तू कई दिनों से कह भी रही थी कि हे बनवारी! होली आ रही है। यदि तुझे माता पिता आदि गुरुजनों का डर हो तो यमुना पार उतर चल और यदि तुझे मेरे प्रति कुछ शंका हो तो अपने साथ समस्त सखियों को भी लिये चल।"कृपालु के शब्दों में श्यामसुन्दर कहते हैं कि अपने मन की सब चाह पूरी कर ले क्योंकि मैं ही तेरा आध्यात्मिक प्रियतम हूँ।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 703-704