होरी-माधुरी · पद 26
हट लिपट न, निपट यमुन-तट पै।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: haṭa lipaṭa na, nipaṭa yamuna-taṭa pai
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हट लिपट न, निपट यमुन-तट पै।
2तजु चंचल अंचल-पट लखु सखि, लखति दृगंचल पनघट पै।
3वा दिन बाँह मरोरि मोरि दिय, फोरि मारि लकुटी घट पै।
4करि बरजोरी मुख मलि रोरी, तोरी लर वंशीवट पै।
5करत रीत अनरीत मीत! कत?, लगत कलंक प्रीत-पट पै।
6धनि “कृपालु” यारी सँग गारी, धनि-धनि वारी लंपट पै॥
हिन्दी भावार्थ
होली के दिनों में नन्दकुमार के नटखट व्यवहार से तंग आकर एक सखी उनसे कहती है-''अरे निर्लज्ज! हरो यमुना के किनारे मुझ से न लिपटो। अरे चंचल! मेरा आंचल छोड़ दो। देखो! पनघट पर खड़ी सखियाँ तिरछी दृष्टि से देख रही हैं। तुमने उस दिन बरबस मेरी कलाई मोड़ दी और लठिया मार कर घड़ा फोड़ दिया। एक दिन वंशीवट पर बरबस मेरे मुख पर गुलाल मल दिया तथा मेरी मोतियों की लड़ तोड़ दी। यद्यपि तुम मेरे प्रियतम हो किन्तु ऐसा लोक विरुद्ध व्यवहार हमारे प्रेम में कलंक बन जायगा''। 'कृपालु' ने कहा - ''बलिहारी है सखी के प्यार पर जो एक ओर सर्वस्व समर्पण करती है, दूसरी ओर गाली देती है एवं बलिहारी है उन लम्पट श्यामसुन्दर पर जो ऐसे व्यवहार पर भी बलिहार जाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 702-703